आधुनिकता की चकाचौंध में लुप्त हो रही कला और परंपरा संझा माई
नसरूल्लागंज। आधुनिकता की चकाचौध ने लोक संस्कृति के कई रंगों को धूमिल कर कर दिया है। ऐसा ही एक खेल है संझा जो जो ग्रामीण अंचलों में श्राद्ध पक्ष के सोलह दिन चलता था लेकिन अब यहां कहीं कहीं ही देखने में नजर आता है।

कुछेक बर्षो पूर्व यह खेल नगरीय क्षेत्रों सहित अधिकतर ग्रामीण क्षेत्रों की नव युवतियां और बालिकाएं गांवों में खेलती थीं हालांकि कही कही अभी भी खेला जाता है जिसे संझा देखकर अपना बचपन याद आ जाता है। संझा गीत गाए जाते हैं जो वास्तव में बाल कविताएं हैं। इनके अर्थ और भाव के बजाय अटपटे ध्वनि प्रधान शब्द और
गाने वालों की मस्ती भरी सपाट शैली स्वतः अपनी और आकर्षित कर लेती थी। कुछ गीतों को बरसों बरस से दोहराने से शब्द घिस कर नये रूप पा गए हैं कहीं अर्थहीन हैं या अन्य अर्थ देते हैं । किन्तु बच्चों को इस सबसे क्या उनका उत्सव तो गोबर से बनाएं भित्ति चित्रों की रचनात्मकता गीतों की अल्हड़ अलबेली ध्वनियों से है। ग्रामीण अंचलों में यह त्यौहार श्राद्ध पक्ष के सोलह दिन चलता है। यूं तो तैयारियाँ तो प्रतिदिन सुबह से प्रारम्भ हो जाती थी पर शाम होते होते गावँ की सारी युवतियाँ एंव बालिकाएं एक जगह इकट्ठा हो जाया करती थी । फिर किसी दीवार को चिन्हांकित करके
गोबर से उसको लीपकर उस पर जो कृतियां बनाते थे वाकई वो अदभुत थी। संसाधनों की कमी के वावजूद घर की कुछ चीजों से या प्रकृति के फूल, पत्तों से उस दीवार पर जो रोजाना अलग अलग कृतियां बनाई जाती थी। जिन्हें कोट कहा जाता था। वो सिर्फ एक कृतियाँ नहीं थी बल्कि सोलह दिनों तक उन बालिकाओं का एक महा उत्सव था। ये उत्सव हमारी लोक संस्कृति का अभिन्न अंग है। जिसको सहेजने का काम गांव की छोटी-छोटी लड़कियां करती हैं।
इस संबंध में समाजसेवी श्रीमति रचना भारी बताती है कि ग्रामीण क्षेत्रों में प्रचलित किंवदतियाँ अनुसार इस
ब्रत को सर्व प्रथम पार्वती ने भगवान शिव को प्रसन्न कर प्राप्त करने के लिये किया गया था। तभी से नगरीय क्षेत्र सहित गांवों में छोटी छोटी बालिकाओं द्वारा मनाया जाता है। इस त्यौहार की खासियत यह है कि इसमे शुरूआती आठ दिनों खूब हंसी खुशी गीत संगीत के साथ मनाया जाता है परन्तु बाद के आठ दिन पूजन अर्चन के साथ अबोला (मौन व्रत) रखकर मनाया जाता है। फिलहाल यह त्यौहार सिर्फ ग्रामीण क्षेत्रों में कुछेक स्थानों पर ही मनाया जाता है।