श्रद्धांजलि समाचार
पूर्व पटवारी श्रद्धेय श्री आत्माराम दुबे जी का स्वर्गवास
क्षेत्र ने खोया सरल, निष्पक्ष और कर्मनिष्ठ व्यक्तित्व
रेहटी।
मुकेश मेहता
ग्राम पंगरा निवासी, पूर्व पटवारी श्रद्धेय श्री आत्माराम दुबे जी का दिनांक 6 फरवरी 2026 को लगभग 100 वर्ष की आयु में देवलोक गमन हो गया। उनके निधन से न केवल दुबे परिवार, बल्कि नर्मदापुरम एवं सीहोर जिले के सम्पूर्ण क्षेत्र में शोक की लहर व्याप्त है। क्षेत्रवासियों ने एक ऐसे व्यक्तित्व को खो दिया है, जो कुशल, सहज, सरल, निष्पक्ष एवं कर्मनिष्ठ जीवन के लिए सदैव स्मरणीय रहेंगे।
श्रद्धेय श्री आत्माराम दुबे जी, ग्राम पंगरा निवासी अशोक दुबे, अरविंद दुबे (देवीधाम सलकनपुर ट्रस्ट सदस्य) एवं मुकेश दुबे के पूज्य पिताजी थे। वर्ष 1928 में जन्मे दादा जी का व्यक्तित्व क्षेत्र के जन-जन के हृदय पटल पर अमिट छाप छोड़ गया।
उन्होंने अपने जीवनकाल में अंग्रेज़ी एवं नवाबी शासन को निकट से देखा। युवा अवस्था में उन्होंने अध्यापक एवं पुलिस विभाग में भी सेवाएँ दीं, किंतु अपने जीवन सिद्धांतों के कारण अल्प अवधि में ही दोनों सेवाओं से त्यागपत्र देकर राजस्व विभाग में पटवारी के पद पर कार्यभार ग्रहण किया। पटवारी के रूप में उन्होंने पूर्ण ईमानदारी, निष्ठा और निष्पक्षता के साथ शासन के साथ-साथ क्षेत्र के किसानों एवं किसान परिवारों के हित में अविस्मरणीय कार्य किए।
दादा जी का आम जनता से आत्मीय रिश्ता था। घर-घर में उनके प्रति विश्वास और सम्मान था, जो उनके पूरे परिवार के लिए भी एक पहचान और विरासत बन गया। उन्होंने अपने जीवन में कर्म को प्रधानता दी, साथ ही अध्यात्म के क्षेत्र में भी विशेष योगदान दिया। नर्मदा जी के तट पर निवासरत रहते हुए उन्होंने मंदिरों, देवालयों, आश्रमों एवं साधु-संतों की सेवा में स्वयं को समर्पित किया।
वे पूज्य श्री श्री 1008 श्री दादाजी धूनी वाले के परम भक्त थे। आबलीघाट दक्षिण तट स्थित श्री दादाजी दुर्गानंद जी महाराज के आश्रम के निर्माण एवं सेवा कार्यों में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। यह आश्रम आज क्षेत्र के लिए उनकी एक अमूल्य आध्यात्मिक विरासत के रूप में स्थापित है।
परिवार, कुटुंब एवं समाज के प्रति उनका व्यवहार सदैव समान, सहज और प्रेमपूर्ण रहा। रिश्तों में भाईचारा, अपनापन, सहयोग और समर्पण उनके व्यक्तित्व की विशेष पहचान थी। उनकी बोलचाल में कभी भेदभाव नहीं रहा—चाहे सामने कोई बड़ा हो, छोटा हो या समकक्ष। विशेष रूप से वे बच्चों से अत्यंत स्नेहपूर्वक और सरल भाव से संवाद करते थे।
उनका प्रभाव इतना व्यापक था कि उनके नाम और कर्मों के कारण परिजनों को सामाजिक, व्यावसायिक और राजनैतिक क्षेत्र में सम्मान और पहचान मिली। परिवारजनों को जनपद पंचायत विकासखंड बुधनी, माँ बिजासन देवी ट्रस्ट सलकनपुर सहित विभिन्न सामाजिक दायित्वों का जो अवसर मिला, उसे परिजन उनके पुण्य प्रताप का ही परिणाम मानते हैं।
लगभग 100 वर्ष की सतायु में देह त्याग करते समय भी अंतिम यात्रा में बड़ी संख्या में आम नागरिक उपस्थित रहे। लोगों ने उन्हें संत पुरुष और देव पुरुष कहकर श्रद्धापूर्वक अंतिम विदाई दी।
श्रद्धेय आत्माराम दुबे जी का सांसारिक शरीर भले ही पंचतत्व में विलीन हो गया हो, किंतु उनका आदर्श जीवन, व्यक्तित्व और संस्कार आने वाली पीढ़ियों के लिए सदैव प्रेरणास्रोत बने रहेंगे

