भक्ति की शक्ति से ही मिलती है मनुष्य जन्म से मुक्ति..पं.श्री हरिशंकर शास्त्री
रमगढा़-क्षेत्र का प्रसिद्ध धार्मिक तीर्थ स्थल श्री रूद्र धाम आश्रम रमगढ़ा में श्री श्री 1008 श्री परमानंद जी परमहंस महाराज के संरक्षण श्री श्री 108 श्री बजरंग गिरी जी महाराज के मार्गदर्शन में संगीतमय श्रीमद् भागवत कथा का आज द्वितीय दिवस मैं पंडित हरि शंकर शास्त्री द्वारा नारद जी के पूर्व जन्म की कथा को विस्तार से समझाते हुए बताया कि एक दिन की बात है महर्षि वेदव्यास प्रातःकाल उठकर स्नान आदि करके सरस्वती नदी के तट पर स्थित अपने आश्रम पर बैठे थे । उन्होनें महाभारत और देवताओं के पराक्रम और लीलाओं से पूर्ण अनेक पुराणों का निर्माण किया था लेकिन फिर भी उनके मन को संतोष नही मिला था । उसी समय देवर्षी नारद उस स्थान पर आए , नारदजी को देख कर वेदव्यास ने उनका स्वागत किया और उनसे अपने मन की बात कही । वेदव्यास ने कहा , देवर्षी मैन इतिहास स्वरूप महाभारत की रचना की परंतु फिर भी इसके रचना के बाद जिस संतोष की आशा मैन की थी वह मुझे नही मिला । आप मुझे बताइये मैं अब क्या करूँ , वेदों के सार को दर्शाने वाले इस महान ग्रंथ की रचना के बाद भी मुझे शांति नही मिल रही है ।वेदव्यास की बाते सुनकर नारद जी ने कहा , आपने वेदों के सार स्वरूप इस महान महाभारत की रचना बहोत ही विस्तार से की है परंतु इसमें आपने भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं का वर्णन विस्तार से नही किया है । भगवान अपनी लीलाओं के गुणगान से अधिक प्रसन्न होते है । आप ऐसे ग्रंथ की रचना कीजिये जो भगवान की भक्ति की वृद्धि कराने वाला हो । भक्ति के अतिरिक्त भगवान को प्रसन्न करने का और कोई मार्ग नही है । व्यासजी , मैं आपको अपनि ही पूर्वजन्म की कथा सुनाता हूँ की किस तरह भगवान की भक्ति से ही मुझे मनुष्य जन्म से मुक्ति मिली और भगवान का परम भक्त होने का सौभाग्य मिला ।
नारद जी कहते है , पिछले कल्प में मैं एक दासी का पुत्र था । मेरी माता दुसरो के घर मे काम करके अपनी जीविका चलती थी । बहोत मेहनत करके मेरी माँ मेरा लालन पालन करती थी और मुझसे बहोत प्रेम भी करती थी । पिता न होने के कारण मुझे पालने काम मेरी माता का ही था । एक समय की बात है हमारे गांव में साधुओं की एक टोली आयी । मैं उस टोली के साथ रहने लगा और उन साधुओं की सेवा करने लगा । मैं दिन भर उनके पीछे ही घूमता था । जब साधु लोग खाना खा लेते तो उनका बचा हुआ भोजन मैं खा लेता था । साधु संग से ही मुझमे भक्ति जागृत होगयी थी और भगवान के दर्शन की लालसा जागृत हुई । अब मेरा मन हमेशा भगवान की लीलाओं के चिंतन में ही लगा रहता था । उन साधुओं के संग से मेरा जीवन सफल होगया था । आयु से मैं पांच वर्ष का ही था परंतु मुझे संसार मे कोई रुचि नही थी । मेरा तो मन करता था कि मैं उन साधुओं के साथ ही चला जाऊं । लेकिन मुझे मेरी माता के मोह ने रोक रखा था, मेरे सिवा उसका इस संसार मे कोन था जिसके लिए ओ इतना परिश्रम करती । व्यासजी कुछ दिन ओ साधु लोग मेरे गाँव मे रहकर चले गए । उनके संग से मुझे इस भवसागर से मुक्ति पाने का मार्ग मिल गया था ।

