सलकनपुर देवीधाम पर तैयारी हुई पूरी। नवरात्र: आज से नौ दिन गूंजेंगे मातारानी के जयकारें।
रेहटी
मुकेश मेहता
9425342666

सीहोर. सोमवार से शारदीय नवरात्र की शुरूआत होते ही हर तरफ मातारानी के जयकारों की गूंज सुनाई देने लगेगी। सलकनपुर देवीधाम पर भी नवरात्र को लेकर तैयारी पूरी हो गई है। श्रद्धालुओं को माता के आसानी से दर्शन हो इसलिए 21 घंटे मंदिर खुला रहेगा।
अलसुबह तीन बजे सलकनपुर देवीधाम मंदिर के पट खुलेंगे और रात 12 बजे बंद होंगे। रात 12 से 3 बजे यानी तीन घंटे ही मंदिर बंद रहेगा, जबकि 21 घंटे श्रद्धालुओं के दर्शन करने खुला रहेगा। नवरात्र के पहले दिन करीब 30 हजार से अधिक श्रद्धालुओं के पहुंचने का अनुमान है। इसके लिए मंदिर में विशेष व्यवस्था की गई है, जिससे कि श्रद्धालुओं को मातारानी के आसानी से दर्शन हो और किसी तरह की समस्या नहीं उठाना पड़े।
प्रदेशभर से आते हैं श्रद्धालु
सलकनपुर देवीधाम प्राचीन होने से पूरे प्रदेश में प्रसिद्ध है। वैसे तो मंदिर में 12 महीने ही श्रद्धालुओं के आने जाने का दौर चलता है, लेकिन शारदीय नवरात्र में उनकी तादात हजारों में रहती है। मंदिर के बारे में कहा भी जाता है कि जो श्रद्धालु सच्चे मन से मां के दरबार में आता है, उसकी हर मुराद पूरी होती है। नवरात्र में पैदल तो कोई वाहन में सवार होकर जयकारें लगाकर मां विजयासन के दरबार में मत्था टेकने आता है। सलकनपुर देवीधाम ट्रस्ट अध्यक्ष महेश उपाध्याय ने बताया कि इस बार दो और चार पहिया वाहन खड़ा करने पार्किंग के इंतजाम किए हैं। पार्किंग के अंदर ही श्रद्धालु अपने वाहन खड़े कर सकेंगे।
हाथी पर आएगी मातारानी
पंडितों के अनुसार मातारानी का वाहन यूं तो सिंह होता है, लेकिन तिथि दिन के अनुसार हर साल मातारानी का वाहन अलग अलग होता है। मातारानी सिंह के बजाय दूसरी सवारी पर सवार होकर भी पृथ्वी पर आती है। शास्त्रों में कहा है कि रविवार,सोमवार को कलश स्थापना होने पर मां हाथी पर आती है, शनिवार व मंगलवार को घोड़ा,गुरुवार व शुक्रवार को डोली वाहन पर आती है। इस बार सोमवार को नवरात्र का आरंभ होने से मातारानी का आगमन हाथी पर होगा। जिससे बारिश की अधिकता, चारों और हरियाली, प्राकृतिक सौंदर्य,अन्न,धन की समृद्धि होगी। वर्षभर धर्म व मंगल कार्यो में वृद्धि रहेगी।
“वर्जन…”
सलकनपुर देवीधाम पर हमारी तरफ से सभी तैयारी पूरी कर ली गई है। श्रद्धालुओं के लिए 21 घंटे मंदिर खुला रहेगा। इस समय में श्रद्धालु आसानी से मातारानी के दर्शन कर सकेंगे।
“महेश उपाध्याय, अध्यक्ष सलकनपुर देवीधाम ट्रस्ट”


मंदिर की जानकारीएवं इतिहास
सीहोर जिले में है रेहटी तहसील के सलकनपुर नामक गांव। यहां स्थित 1000 फीट ऊंची पहाड़ी पर विराजमान है बिजासन देवी। यह देवी मां दुर्गा का अवतार हैं। देवी मां का यह मंदिर MP की राजधानी भोपाल से 75 किमी दूर है। वहीं यह पहाड़ी मां नर्मदा से 15 किलोमीटर दूर स्थित है। इस मंदिर पर पहुंचने के लिए भक्तों को 1400 सीढ़ियों का रास्ता पार करना पड़ता है। जबकि इस पहाड़ी पर जाने के लिए कुछ वर्षों में सड़क मार्ग भी बना दिया गया है। यहां पर दो पहिया और चार पहिया वाहन से पहुंचा जा सकता है। यह रास्ता करीब साढ़े 4 किलोमीटर लंबा है। इसके अलावा दर्शनार्थियों के लिए रोप-वे भी शुरू हो गया है, जिसकी मदद से यहां 5 मिनट में पहुंचा जा सकता है शुरू से ही लोगों के मन में मां विजयासन धाम की उत्पत्ति, प्राकट्य, मंदिर निर्माण को लेकर जिज्ञाषा रही है। लेकिन अभी तक इसके कोई भी ठोस साक्ष्य और प्रमाण नही मिल पाए हैं। कुछ पंडितो का कहना है कि यहां मां का आसन गिरने से यह विजयासन धाम बना लेकिन विजय शब्द का योग कैसे हुआ, इसका सटीक उत्तर वे नही दे पाएं है। लेकिन हम आपको बता दे कि मां विजायासन धाम के प्राकट्य का का सटीक उत्तर व उल्लेख श्रीमद् भागवत महापुराण में है। जो इस प्रकार है-

श्रीमद् भागवत कथा के अनुसार जब रक्तबीज नामक देत्य से त्रस्त होकर जब देवता देवी की शरण में पहुंचे। तो देवी ने विकराल रूप धारण कर लिया। और इसी स्थान पर रक्तबीज का संहार कर उस पर विजय पाई। मां भगवति की इस विजय पर देवताओं ने जो आसन दिया, वही विजयासन धाम के नाम से विख्यात हुआ। मां का यह रूप विजयासन देवी कहलाया।
मंदिर निर्माण के संबंध में पीड़ी दर पीड़ी चली आ रही किवदंती के अनुसार आज से करीब 300 वर्ष पूर्व बंजारो द्वारा उनकी मनोकामना पूर्ण होने पर इस मंदिर का निर्माण किया गया था। मंदिर निर्माण और प्रतिमा मिलने की इस कथा के अनुसार पशुओं का व्यापार करने वाले बंजारे इस स्थान पर विश्राम और चारे के लिए रूके। अचानक ही उनके पशु अदृष्य हो गए। इस तरह बंजारे पशुओं को ढूंडने के लिए निकले, तो उनमें से एक बृद्ध बंजारे को एक बालिका मिली। बालिका के पूछने पर उसने सारी बात कही। तब बालिका ने कहा की आप यहां देवी के स्थान पर पूजा-अर्चना कर अपनी मनोकामना पूर्ण कर सकते हैं। बंजारे ने कहा कि हमें नही पता है कि मां भगवति का स्थान कहां है। तब बालिका ने संकेत स्थान पर एक पत्थर फेंका। जिस स्थान पर पत्थर फेंका वहां मां भगवति के दर्शन हुए
और उन्होने मां भगवति की पूजा-अर्चना की। कुछ ही क्षण बाद उनके खोए पशु मिल गए। मन्नत पूरी होने पर बंजारों ने मंदिर का निर्माण करवाया। यह घटना बंजारों द्वारा बताये जाने पर लोगों का आना शुरू हो गया और वे भी अपनी मन्नत लेकर आने लगे।
हिंसक जानवरों, चौसठ योग-योगिनियों का स्थान होने से कुछ लोग यहां पर आने में संकोच करते थे। तब स्वामी भद्रानंद ने यहां तपस्या कर चौसठ योग-योगिनियों के लिए एक स्थान स्थापित किया। तथा मंदिर के समीप ही एक धुने की स्थापना की। और इस स्थान को चैतन्य किया है। तथा धुने में एक अभिमंत्रित चिमटा, जिसे तंत्र शक्ति से अभिमंत्रित कर तली में स्थापित किया गया है। आज भी इस धुने की भवूत को ही मुख्य प्रसाद के रूप में भक्तगणों को वितरित किया जाता है। बाघ करता है माता की परिक्रमाबताया जाता है कि नजदीकी रातापानी के जंगलों से बाघ भी माता के मंदिर तक पहुंच जाता है। भक्तों मानते हैं कि मां दुर्गा का यह वाहन माता के दर्शन करने के लिए मंदिर के आसपास तक पहुंच जाता है। कुछ ग्रामीण बताते हैं कि कई बरसों पहले जब यहां मंदिर का निर्माण नहीं हुआ था तो बाघ मंदिर के आसपास ही रहता था। धीरे-धीरे भक्तों की श्रद्धा उमड़ी और आज विजयासन देवी धाम बड़ा तीर्थ बन गया है
यहाँ प्रतिदिन सैकड़ों श्रद्धालु आते हैंइसके अलावा प्रतिवर्ष यहाँ माघ के महीने में भव्य मेला लगता है जो की देखते ही बनता है |
स्थापना : सलकनपुर का मां विजयासन धाम प्रसिद्ध शक्तिपीठों में शामिल है। इसकी स्थापना का समय स्पष्ट रूप से नहीं पता लेकिन इतना ज्ञात है कि इस मंदिर का निर्माण 1100 ई. के करीब गौंड राजाओं द्वारा किला गिन्नौरगढ़ निर्माण के दौरान करवाया गया था। प्रसिद्ध संत भद्रानंद स्वामी ने मां विजयासन धाम में कठोर तपस्या की। उन्होंने नल योगिनियों की स्थापना कर क्षेत्र को सिद्ध शक्तिपीठ बनाया था। लाखों भक्त इस तपस्या स्थली पर पहुंचते हैं और मन्नत मांगते हैं।
विशेषता : कहा जाता है कि राक्षस रक्तबीज के वध के बाद माता जिस स्थान पर बैठी थीं, उसी स्थान को विजयासन के रूप में जाना जाता है। इसी पहाड़ी पर सैकड़ों जगहों पर रक्तबीज से युद्ध के अवशेष नजर आते हैं। नवरात्र में इस स्थान पर लाखों श्रद्धालु मन्नत पूरी होने पर चढ़ावा-चढ़ाने, जमाल चोटी उतारने और तुलादान कराने पहुंचते हैं। परिसर सर्वसुविधायुक्त है।
वास्तुकला : दक्षिणमुखी पाषाण मूर्ति है। मूर्ति के सामने भैरव जी स्थापित हैं।
यहां है : जिला मुख्यालय सीहोर से 80 किमी दूर रेहटी तहसील में
ऐसे पहुंचे : रेल मार्ग से भोपाल से 75 किमी की दूरी पर है। होशंगाबाद से 40 किमी की दूरी पर, इंदौर से 180 किमी और सीहोर से 90 किमी की दूरी पर बस द्वारा मां विजयासन धाम पहुंचा जा सकता है।
