नरवाई जलाने पर लगाया गया प्रतिबंध नरवाई का उपयोग जैविक खाद बनाने में कर सकते है किसान भाई
अपर कलेक्टर श्री ब्रजेश सक्सेना ने जिले में फसल कटाई के बाद खेतो में नरवाई जलाने पर तत्काल प्रभाव से रोक लगाई है। यह आदेश 1973 की धारा 144 के अंतर्गत जारी किया गया है। जारी आदेशानुसार संपूर्ण जिले के लिए यह प्रतिबंधात्मक आदेश जारी किया गया है कि कोई भी व्यक्ति नरवाई नहीं जलाएगा अथवा खेत में आग नहीं लगाएगा। यह आदेश संपूर्ण जिले में निवास करने वाली सभी व्यक्तियों तथा अस्थायी तौर से आने जाने वाले समस्त व्यक्तियों पर लागू होगा। यदि कोई व्यक्ति इस आदेश का उल्लंघन करता है तो उसके विरूद्ध आपराधिक प्रकरण कायम कर वैधानिक कार्यवाही की जाएगी।
उल्लेखनीय है कि किसानों द्वारा फसल काटने के बाद खेत को साफ करने की दृष्टि से खेतों में आग लगा दी जाती है, जिसे नरवाई जलाना कहते है। यह चलन कई बार लोक परिशांति भंग करने की स्थिति उत्पन्न करता है तथा मानव जीवन और स्वास्थ्य पर भी प्रतिकूल प्रभाव डालता है। साथ ही इससे आसपास की फसलों और मकानों को आग के कारण नुकसान पहुंचता है। नरवाई जलाने से आसपास के खेतों में भी फसल एवं निकट के आबादी वाले क्षेत्रों में संपत्ति का नुकसान होने की संभावना भी रहती है।
नरवाई जलाने की अपेक्षा अवशेषों और डंठलों को एकत्र कर जैविक खाद जैसे भू-नाडेप, वर्मी कम्पोस्ट आदि बनाने में उपयोग किया जाए तो वे बहुत जल्दी सड़कर पोषक तत्वों से भरपूर कृषक स्वयं का जैविक खाद बना सकते हैं। खेत में कल्टीवेटर,रोटावेटर या डिस्क हेरो आदि की सहायता से फसल अवशेष भूमि में मिलाने से आने वाली फसलों में जीवांश खाद की बचत की जा सकती है। साथ ही पशुओं के लिए भूसा और खेत के लिए बहुमूल्य पोषक तत्वों की उपलब्धता बढ़ने के साथ मिट्टी की संरचना को बिगड़ने से बचाया जा सकता है। कम्बाईन हार्वेस्टर के साथ स्ट्रॉ मेनेजमेंट सिस्टम को सामान्य हार्वेस्टर से गेहूं कटवाने के स्थान पर स्ट्रारीपर एवं हार्वेस्टर का प्रयोग करें।
खेत में कृषि अपशिष्टों को जलाने से होती है कई हानियां
खेत में गेहूं एवं अन्य फसलों के कृषि अपशिष्टों को जलाने से भूमि में उपलब्ध जैव विविधता समाप्त हो जाती है। भूमि में उपस्थित सूक्ष्म जीव जलकर नष्ट हो जाते है। सूक्ष्म जीवों के नष्ट होने के फलस्वरूप जैविक खाद का निर्माण बंद हो जाता है। भूमि की ऊपरी पर्त में ही पौधों के लिये आवश्यक पोषक तत्व उपलब्ध रहते है। आग लगाने के कारण पोषक तत्व जलकर नष्ट हो जाते हैं। भूमि कठोर हो जाती है, जिसके कारण भूमि की जल धारण क्षमता कम होने से फसलें सूखती है। खेत की सीमा पर लगे पेड़ पौधे (फल, वृक्ष आदि) जलकर नष्ट हो जाते है। पर्यावरण प्रदूषित हो जाता है। यातावरण के तापमान में वृद्धि होती है, जिससे धरती गर्म होती है।कार्बन से नाईट्रोजन तथा फास्फोरस का अनुपात कम हो जाता है। केंचुए नष्ट हो जाते हैं। इस कारण भूमि की उर्वरा शक्ति कम हो जाती है। नरवाई जलाने से जन धन की हानि होती है।